भारतीय संस्कृति में विवाह को केवल एक सामाजिक समझौता नहीं, बल्कि ‘सोळह संस्कारों’ में से एक प्रमुख संस्कार माना गया है। यह दो आत्माओं का नहीं, बल्कि दो परिवारों और परंपराओं का मिलन है।
महर्षि मनु ने ‘मनुस्मृति’ (अध्याय 3) में विवाह की 8 विधियों का वर्णन किया है। यह सूची हमें यह समझने में मदद करती है कि प्राचीन भारत में समाज कितना विविध था और रिश्तों को लेकर उनकी समझ कितनी गहरी थी।
इन 8 प्रकारों को शास्त्रों ने दो श्रेणियों में बाँटा है: प्रशस्त (धर्मसम्मत) और अप्रशस्त (निंदनीय)।

१. प्रशस्त विवाह (समाज द्वारा स्वीकृत और सम्मानित)
ये वे विवाह हैं जो धर्म और समाज की मर्यादा को बढ़ाते हैं। आज भी भारतीय समाज में इन्हीं का चलन सर्वाधिक है।
1. ब्राह्म विवाह (सर्वोत्तम विवाह) यह विवाह का सबसे आदर्श रूप है। इसमें पिता अपनी पुत्री को वस्त्र-आभूषणों से सुसज्जित कर, एक विद्वान और सदाचारी वर को आमंत्रित कर उसे कन्यादान करता है।
- विशेषता: इसमें कोई लेन-देन या जबरदस्ती नहीं होती। आज के समय का ‘अरेंज्ड मैरिज’ (Arranged Marriage) इसी का आधुनिक रूप है।
- उदाहरण: शिव और पार्वती का विवाह या राम और सीता का विवाह इसी श्रेणी के उच्चतम आदर्श माने जाते हैं।
2. दैव विवाह प्राचीन काल में जब कोई पिता किसी बड़े यज्ञ का आयोजन करता था, तो वह यज्ञ संपन्न कराने वाले पुरोहित (ऋत्विज) के गुणों से प्रसन्न होकर अपनी कन्या का विवाह उनसे कर देता था।
- भाव: यह सेवा और धर्म के प्रति समर्पण का प्रतीक था।
3. आर्ष विवाह इसमें वर पक्ष, कन्या पक्ष को ‘एक जोड़ी गाय और बैल’ देता था।
- महत्वपूर्ण: इसे दहेज़ या कन्या का मूल्य नहीं माना जाता था, बल्कि यह कृषि प्रधान समाज में गृहस्थ जीवन शुरू करने के लिए एक शुभ प्रतीक था। यह ऋषियों के बीच प्रचलित था।
4. प्राजापत्य विवाह यह ब्राह्म विवाह जैसा ही है, लेकिन इसमें पिता वर-वधू को स्पष्ट आदेश देता है— “तुम दोनों साथ मिलकर धर्म का आचरण करो।”
- विशेषता: इसमें गृहस्थ धर्म के पालन और वफादारी पर सबसे अधिक जोर दिया जाता है।
२. अप्रशस्त विवाह (विवादित या निंदनीय)
शास्त्रों ने इनका उल्लेख इसलिए नहीं किया कि इनका पालन हो, बल्कि इसलिए किया ताकि समाज में हो रही हर प्रकार की घटना को ‘विवाह’ की कानूनी मान्यता मिल सके और स्त्री को उसका अधिकार मिले।
5. असुर विवाह (खरीद-फरोख्त) जब वर पक्ष, कन्या के परिवार को धन देकर कन्या को ‘खरीदता’ है, तो उसे असुर विवाह कहते हैं।
- क्यों है निंदित: इसमें कन्या को एक वस्तु समझा जाता है, इसलिए इसे ‘असुर’ (दानवीय) प्रवृत्ति माना गया। महाभारत में राजा पांडु ने माद्री के परिवार को धन देकर विवाह किया था, जिसे इसी श्रेणी में रखा जाता है।
6. गांधर्व विवाह (प्रेम विवाह) जब वर और कन्या परिवार की अनुमति के बिना, केवल आपसी प्रेम और आकर्षण के आधार पर विवाह कर लेते हैं।
- आधुनिक संदर्भ: इसे आज का ‘Love Marriage’ कहा जा सकता है।
- पौराणिक उदाहरण: दुष्यंत और शकुंतला का विवाह इसका सबसे प्रसिद्ध उदाहरण है। ऋग्वेद और महाभारत में इसे क्षत्रियों के लिए स्वीकार्य माना गया था, लेकिन चूंकि इसमें बड़ों का आशीर्वाद नहीं होता, इसलिए इसे श्रेष्ठ नहीं माना गया।
7. राक्षस विवाह (हरण द्वारा विवाह) जब कन्या की इच्छा के विरुद्ध या युद्ध में उसे जीत कर, उसका अपहरण करके विवाह किया जाता है।
- पौराणिक उदाहरण: भगवान कृष्ण द्वारा रुक्मिणी का हरण या अर्जुन द्वारा सुभद्रा का हरण। (हालांकि, रुक्मिणी और सुभद्रा के मामलों में उनकी मौन सहमति थी, इसलिए इसे क्षत्रिय धर्म का हिस्सा माना गया, लेकिन सामान्य समाज के लिए यह वर्जित था)।
8. पैशाच विवाह (सबसे घृणित) यह मानवता के विरुद्ध अपराध है। जब कन्या सो रही हो, नशे में हो, या मानसिक रूप से असंतुलित हो और उसके साथ छलपूर्वक संबंध बनाए जाएं और फिर उसे विवाह का नाम दिया जाए।
- सच्चाई: शास्त्रों ने इसे ‘विवाह’ की श्रेणी में केवल इसलिए रखा ताकि उस पीड़ित स्त्री को पत्नी का सम्मान और अधिकार मिल सके, उसे समाज से बहिष्कृत न किया जाए। नैतिक रूप से यह पूर्णतः पाप है।
निष्कर्ष: हम इससे क्या सीखते हैं?
मनुस्मृति में वर्णित ये 8 प्रकार केवल इतिहास नहीं हैं। ये बताते हैं कि विवाह का आधार ‘धर्म और सम्मान’ (प्रशस्त) होना चाहिए, न कि ‘वासना, धन या बल’ (अप्रशस्त)।
आज के दौर में हम मुख्य रूप से ‘ब्राह्म विवाह’ (अरेंज्ड) और ‘गांधर्व विवाह’ (लव मैरिज) का मिश्रण देखते हैं। तरीका चाहे जो भी हो, विवाह की सफलता आज भी उसी मूल मंत्र पर टिकी है जो ‘प्राजापत्य विवाह’ में कहा गया था—
“धर्मेच अर्थेच कामेच नातिचरितव्या” (धर्म, अर्थ और काम में, मैं तुम्हारा साथ कभी नहीं छोडूंगा।)


सनातन धर्म की यही विशेषता है
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